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कोई उत्तर है ?

Posted On: 23 Jan, 2017 Politics में

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देश में ५ राज्यों में चुनाव हैं, पर इसका उत्तर शायद सबके ही पास है कि उत्तर प्रदेश ही क्यों मीडिया और राजनितिक दलों का सर्वप्रिय राज्य बना हुआ है | ये चुनाव उस समय आते हैं जहाँ से अगले लोकसभा के चुनाव साफ़ देखे जा सकते हैं और वैसे भी दिल्ली का रास्ता हमेशा से ही उत्तर प्रदेश से ही होकर गुज़रा है |
इस राज्य कि खुशकिस्मती है कि यहाँ से लोकसभा और राज्यसभा दोनों के लिये ही सर्वाधिक सीट निकलती हैं, पर सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है, आज भी यहाँ की जनता को कुँए और खाई में से अपने बचने के आसार तय करने पड़ते हैं |

विकास यहाँ सिर्फ बच्चों के नाम होते हैं और चुनाव से पहले के जुमले | उत्तर प्रदेश कब बनेगा उत्तम प्रदेश, कोई उत्तर है ?

दलों के बीच सीटों का बंदरबाँट शुरू हो चुका है, जाती और धर्म ही नहीं यहाँ राम और रहीम भी अपनी अपनी पूरी ताकत चुनावों में झोंकते हैं | देश को आज़ाद हुए सत्तर साल हो चुके हैं पर उत्तर प्रदेश को आज के विकास के उस शिखर तक पहुँचने में शायद सत्तर साल और लग जायेंगे, मतलब २०८० में हम शायद २०१० का विकसित उत्तर प्रदेश देख सकते हैं |

ये वो राज्य है जो देश की राजनीती और अर्थव्यवस्था दोनों में ही समान रूप से योगदान देता है, पर जब बात उत्तर प्रदेश की आती है तो गुंडाराज और मायाजाल ही पहले दो शब्द होते हैं जो इसको परिभाषित करते हैं | भारत को सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने वाला ये राज्य आज भी पिछड़ा है और शायद आने वाले कई और साल तक पिछड़ा ही रहेगा, ध्यान रहे यहाँ मैं पिछड़ा का उपयोग किसी और रूप में नहीं कर रहा | जोड़-तोड़, दंगे, भाई-भतीजावाद यहाँ की राजनीती के सर्वनाम हैं जो आने वाले कई सालों तक एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे | इस राज्य का पढ़ा लिखा युवा यहाँ की राजनीती में अपने कार्यालय या फिर गली के बहार वाले पनवाड़ी की दुकान पर चाय और सिगरेट के कश लगते हुए सैकड़ो मील दूर से ही अपना योगदान देता रहता है | अवकाश नहीं मिलेगा और अवसर भी नहीं मिलेगा शायद |

इस राज्य की खास बात ये है कि यहाँ सबसे ज्यादा लोग राजनीती समझते हैं और करते हैं, और जो इनके साथ राजनीती करती है वो समझने में इन्हें ज़माने लग जायेंगे |

किसी ने राम को चुना, किसी ने रहीम को, किसी ने बाबा साहेब को और किसी ने इनमे से ही किसी को |

हाल फिलहाल का मिज़ाज़ ये है कि यहाँ इंसान नहीं मिलेंगे आपको, वोट मिलेंगे, दलित नहीं मिलेंगे, वोट मिलेंगे, ब्राह्मण नहीं मिलेंगे, वोट मिलेंगे, सिया नहीं मिलेंगे सुन्नी नहीं मिलेंगे पर हाँ वोट मिलेंगे | इंसान को इंसान की संज्ञा नहीं मिलेगी, सुनने में अजीब लगेगा पर विमुद्रीकरण के दौर में भी एक बैंक सुचारू रूप से काम कर रहा है, जी हाँ वोट बैंक |

कई प्रश्न हैं परंतु उत्तर उत्तर नहीं है |



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