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सफ़र बाबूजी से डेडी तक

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सौरभ त्रिपाठी दिल्ली में एक सरकारी दफ्तर में कार्यरत हैं , गोरखपुर में पले बढे त्रिपाठी जी के लिए इस बड़े और नए शहर में आ कर खुद को इस शहर के अनुरूप ढालना काफी मुश्किल था पर अब उस बात को दस साल बीत चुके है और त्रिपाठी जी अपनी पत्नी एवं पांच साल के बच्चे के साथ सुखी जीवन यापन करते हैं |
पिताजी के बुलाने के बाद वो कल ही गोरखपुर पहुँचे है एवं अपनी सारी पुरानी यादों को संजो रहे हैं , बाबूजी से हाल चाल एवं शहर की आबो हवा की जानकारी लेने के बाद वो अपने कमरे कि ओर प्रस्थान करने लगे कि रास्ते में मन्नू ने डेडी की पुकार से रोक लिया और मासूमियत से एक प्रश्न किया ” डेडी आप अपने डेडी को बाबूजी क्यों बुलाते हो ? ”
इसपर हंस कर त्रिपाठी जी बोले ” बेटा हम उनको शुरू से ही बाबूजी बुलाते आ रहे हैं और इसका मतलब भी डेडी ही होता है ” , बात ख़त्म होते ही मन्नू ने एक और सवाल पूछा ” क्या मैं भी आपको बाबूजी कह कर पुकार सकता हूँ ?” प्रश्न कोई मुश्किल तो नहीं था पर इस छोटे से प्रश्न ने त्रिपाठी जी के पैरों तले ज़मीन खिसका दी , आखिर अब वो दिल्ली वाले जो हो गए हैं , समाज , आस पड़ोस (हालाँकि जिनसे ज्यादा मतलब नहीं होता है ) बाजार एवं कई अन्य परिदृश्य उनके मस्तिष्क में घूमना शुरू हो गयें |
त्रिपाठी जी इस सोच में पड़ गए की दिल्ली जैसे बड़े शहर में उन्हें उनका बेटा अगर बाबूजी कहेगा तो सोसाइटी (समाज) में उनका कद छोटा हो जायेगा |
आज हमारे बीच ऐसे ही कई त्रिपाठीजी मौजूद है और दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे है, हिंदी के जिन शब्दों के इस्तेमाल से मुख से अलफ़ाज़ निकल कर सीधे ह्रदय को छुते थे आज उन शब्दों के इस्तेमाल से हम कुंठित महसूस करतें है , उनके इस्तेमाल को हम अपने सामाजिक कद के लिए खतरा मानते हैं और सबसे बड़ी बात , शुद्ध हिंदी के प्रयोग को अनपढ़ों की भाषा समझतें है |
शहरी इलाको में हिंदी के खत्म हो रहे अस्तित्व और भाषा के प्रति इस रवैये के कारण आज हमें हिंदी के आत्मसम्मान के लिए चिंतित होना पड़ रहा है | यह कहना कि विदेशी प्रभाव के वजह से इस भाषा को अपने वजूद पर खतरा मंडराता हुआ दिख रहा है तो ये कहना गलत ही होगा क्योंकि अदिकाल से ही भारत में कई बाहरी देशो का वर्चस्व रहा लेकिन उन्होंने इस भाषा को अपनाया न कि हमने उनकी भाषा को अपनाया | आज़ादी कि लड़ाई में भी हिंदी भाषा एक हथियार के रूप मे प्रयुक्त की गयी थी और हमारे देश में हुए विभन्न विद्रोह एवं आन्दोलनों में भी हिंदी भाषा का एक विशाल योगदान है |
आज के कुछ त्रिपाठीजी कि वजह से भाषा अपना भविष्य अधर में ढूँढ़ रही है , जिस अधर में साया भी साथ छोड़ जाता है उसी अधरमें खुद को फिर से तलाशने में जुटी हुई है ये अमृतवाणी |



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Santlal Karun के द्वारा
September 29, 2013

“आज के कुछ त्रिपाठीजी कि वजह से भाषा अपना भविष्य अधर में ढूँढ़ रही है , जिस अधर में साया भी साथ छोड़ जाता है उसी अधर खुद को फिर से तलाशने में जुटी हुई है ये अमृतवाणी |” … आप ने इस आलेख में पते की बात उठाई है ;हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !


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